जाने कहां गए वो दिन -हंसाते-हंसाते रुलाने वाले जोकर के 50 साल

एक करोड़ रुपए (तब यह रकम काफी बड़ी हुआ करती थी) की लागत से बनी ‘मेरा नाम जोकर’ इससे पहले की भारतीय फिल्मों के मुकाबले सबसे लम्बी फिल्म (4.4 घंटे) थी। इसमें दो इंटरवल रखे गए। राज कपूर पर चार्ली चैप्लिन का काफी प्रभाव रहा। अपनी ज्यादातर फिल्मों में वे चैप्लिन की तरह मासूम आम आदमी के किरदार में नजर आए, जो प्रतिकूल हालात में भी सभी को हंसाता-गुदगुदाता रहता है। ‘मेरा नाम जोकर’ एक तरह से उनकी आत्मकथा ही है। यूनानी नाटकों की तरह भव्य और दुखांत करुणा वाली इस फिल्म का नायक सर्कस का जोकर है। वह प्रेम बांटना और पाना चाहता है, लेकिन समय के साथ उसके सपने बिखरते रहते हैं और आखिर में अपने बड़े दिल के साथ वह अकेला रह जाता है।

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अंतरराष्ट्रीय सिनेमा 2020 को इटली के महान फिल्मकार फैडरिको फैलिनी के जन्म शताब्दी वर्ष के तौर पर मना रहा है तो भारतीय सिनेमा के सबसे बड़े शोमैन राज कपूर की ‘मेरा नाम जोकर’ के लिए यह स्वर्ण जयंती वर्ष है। यह फिल्म 18 दिसम्बर, 1970 को सिनेमाघरों में पहुंची थी। फैलिनी जिंदगी की तल्ख हकीकत को सेल्यूलाइड पर उतारते थे, जबकि राज कपूर फिल्मों में भव्यता के साथ रंग-बिरंगे रूमानी सपने दिखाते थे। पहली बार ‘मेरा नाम जोकर’ के जरिए उन्होंने अपनी धारा बदलने की कोशिश की, लेकिन इसकी कारोबारी नाकामी ने उनके सपने चूर-चूर कर दिए। इससे पहले यही हादसा गुरुदत्त की ‘कागज के फूल’ (1959) के साथ हुआ था। आज इन दोनों फिल्मों को भारत की चंद क्लासिक फिल्मों में गिना जाता है, लेकिन 1970 में, जब देव आनंद की ‘जॉनी मेरा नाम’, राजेश खन्ना की ‘सच्चा झूठा’, ‘आन मिलो सजना’, ‘सफर’, ‘द ट्रेन’ तथा मनोज कुमार की ‘पूरब और पश्चिम’ पर धन वर्षा हो रही थी, ‘मेरा नाम जोकर’ दर्शकों के लिए तरस गई। अगर यह फिल्म चल गई होती तो राज कपूर के इसके बाद के सिनेमा का स्वरूप शायद कुछ और होता। इसकी नाकामी के बाद वे रूमानी सपनों की चिर-परिचित दुनिया में लौटकर ‘बॉबी’, ‘सत्यम शिवम सुंदरम’, ‘प्रेम रोग’ और ‘राम तेरी गंगा मैली’ में खालिस मसाले परोसते रहे।

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राज कपूर की दूसरी फिल्मों की तरह ‘मेरा नाम जोकर’ का गीत-संगीत भी फूल में खुशबू और चंदन में पानी की तरह रचा-बसा है। ‘जाने कहां गए वो दिन’, ‘ए भाई जरा देखके चलो’, ‘कहता है जोकर सारा जमाना’ और ‘जीना यहां मरना यहां’ में उस जोकर की टीस को आज भी महसूस किया जा सकता है, जो समाज को जीवन के गहरे दर्शन से जोडऩा चाहता था, लेकिन समाज ने जिससे कहा- ‘बौद्धिकता नहीं, बाजार के साथ चलो।’

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adin

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