एक अकेला इस शहर में मनोज वाजपेयी की ‘भोंसले’ का डिजिटल प्रीमियर

 

सिनेमा जनता से संवाद कायम करने का ताकतवर माध्यम है। जब इस माध्यम का इस्तेमाल सामाजिक जरूरत के तौर पर करने की बात होती है तो इसका मतलब नारेबाजी कतई नहीं होता। ऐसी कोई फिल्म तभी असरदार हो सकती है, जब उसमें सहजता हो, असली अभिव्यक्ति हो। यानी उपदेशक की मुद्रा त्याग कर हमदर्द, हमसफर वाला किरदार अदा किया जा रहा हो। दुनिया विकास की जितनी मंजिलें तय कर चुकी है, आम आदमी की कहानियां उससे भी आगे तक जाती हैं। ऐसे ही एक आदमी की कहानी को ‘भोंसले’ में बड़ी संवेदनशीलता से पेश किया गया है। अफसोस की बात यह है कि लीक से हटकर बनने वाली ऐसी फिल्मों को हमारे यहां सिनेमाघर नसीब नहीं होते। मनोज वाजपेयी की ‘भोंसले’ दो साल पहले तैयार हो चुकी थी।

बुसान के अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह (2018) में प्रीमियर के बाद यह रॉटरडम, बार्सिलोना और सिंगापुर के फिल्म समारोह में भी शिरकत कर चुकी है, लेकिन इसे भारतीय सिनेमाघरों में नहीं उतारा जा सका। आखिरकार शुक्रवार को एक ओटीटी प्लेटफॉर्म पर इसका डिजिटल प्रीमियर हो गया। कम से कम इस तरह की फिल्मों के लिए यह प्लेटफॉर्म बेहतर विकल्प साबित हो रहे हैं।
‘भोंसले’ इसी नाम के एक बुजुर्ग मराठी पुलिसकर्मी (मनोज वाजपेयी) की कहानी है, जो रिटायरमेंट के बाद भीड़भाड़ वाली मुम्बई में अकेलेपन से जूझ रहा है। एक चॉल का छोटा-सा कमरा उसकी दुनिया है। बातूनी लोगों से वह घुल-मिल नहीं पाता। पड़ोसियों ने उसे उसके हाल पर छोड़ रखा है। इसी बीच मुम्बई में बसे दूसरे प्रदेशों के लोगों के खिलाफ माहौल गरमाता है। चिंगारी भोंसले के मोहल्ले तक पहुंचती है। वह खुद मराठी है, लेकिन गैर-मराठियों के खिलाफ तनातनी उसे तनकर खड़ा कर देती है।

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फिल्म में मनोज वाजपेयी की एक्टिंग लाजवाब कर देती है। उनके संवाद बहुत कम हैं, लेकिन चेहरे के हाव-भाव और चलने-फिरने के अंदाज से आखिर तक कहानी में उनकी मौजूदगी महसूस होती है। बाहर से सख्त और शुष्क नजर आने वाले 60 साल के बुजुर्ग के अंदर ज्वार-भाटे का क्या आलम है, यह उन्हें देखकर पता चल जाता है। किरदार को जीना शायद इसी को कहते हैं। निर्देशक देवाशीष माखीजा की इस फिल्म के बाकी कलाकारों (संतोष जुवेकर, विराट वैभव, अभिषेक बनर्जी) का काम भी अच्छा है। सबसे बड़ी बात यह कि फिल्म सहज और संतुलित ढंग से संवेदनाओं का सफर तय करती है।

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adin

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