कई बार टूटा है फिल्मी कलाकारों का हौसला, रोशनी के पीछे की तल्खियां

 

सुशांत सिंह इस मोर्चे पर क्यों हार गए? ऐसा कौन-सा दुर्गम रास्ता था, जो वे पार नहीं कर पा रहे थे? उस अनमोल जिंदगी को उन्होंने क्यों ठुकरा दिया, जो जाने कितनी प्रार्थनाओं और पुण्य कर्मों से हासिल होती है? हैरानी होती है कि जिस फिल्मी दुनिया में ‘राही मनवा दुख की चिंता क्यों सताती है, दुख तो अपना साथी है’ और ‘जीवन चलने का नाम चलते रहो सुबहो-शाम’ जैसे हौसला देने वाले गीत रचे जाते हैं, उसी के कुछ कलाकारों का हौसला इतना कमजोर क्यों होता है, जो किसी दुख को बर्दाश्त करने के बजाय शीशे की तरह टूट जाता है।

चंबल के डाकुओं की पृष्ठभूमि वाली ‘सोनचिडिय़ा’ ( Sonchiriya Movie ) में सुशांत सिंह ( Sushant Singh Rajput ) डाकू के किरदार में थे। इस फिल्म के एक सीन में साथी डाकू (मनोज वाजपेयी) उनसे पूछता है कि क्या उन्हें मरने से डर लग रहा है तो वे कहते हैं- ‘एक जन्म निकल गया इन बीहड़ों में, अब मरने से काहे डरेंगे।’ जिंदगी में भी कभी-कभी बीहड़ों जैसे दुर्गम रास्ते आते हैं। उन्हें हौसले और हिम्मत से पार किया जा सकता है।

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हरेक के जीवन के साथ जाने कितनों के जीवन की डोर जुड़ी होती है- परिजन, रिश्तेदार, संगी-साथी। अफसोस की बात है कि जिस सिनेमा से ‘अपने लिए जिए, जिए तो क्या जिए, तू जी ए दिल जमाने के लिए’ जैसे आदर्श मुखरित होते हैं, उसी के एक सदस्य सुशांत सिंह आत्मघाती कदम उठाकर अपनी जिंदगी पर पूर्णविराम लगा देते हैं और खुद से जुड़े जाने कितने लोगों को उम्रभर का दर्द दे जाते हैं।

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adin

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